अफगानिस्तान का सरेंडर, वैश्विक युद्ध की सुगबुगाहट ?

अफगानिस्तान का सरेंडर और राष्ट्रपति अशफरफ गनी द्वारा देश छोड़ कर चले जाना भारत, अमेरिका समेत फ्रांस, ब्रिटेन जैसे यूरोपीय राष्ट्र संघो के देशों के लिए भी बड़ी चुनौती बन के उभरा है...जिसमे इजरायल भी शामिल है...एक तरफ आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक नीतियां बनाने की बात जोर शोर से कहीं जाती है तो वहीं चीन, पाकिस्तान तथा तुर्की जैसे देशों की नीतियों ने अफगानिस्तान में अपना रंग दिखाया। जो बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। 
        विशेष कर तालिबानियों द्वारा अफगानिस्तान को टेक ओवर करना भारत के लिए शुभ संकेत नहीं। उत्तरी पश्चिमी कश्मीर सीमा में भारत अफगानिस्तान के साथ गिलगिट के रास्ते १०६ किलोमीटर की सीमा रखता है। १९४७ के विभाजन में कबालियो ने इस सीमा का भरपूर इस्तेमाल भी किया था। इसलिए यहां से सटा सीमावर्ती इलाका तालिबानियों के हाथ जाना चिंताजनक है। अफगानिस्तान से नाटो सेना का हटना सबसे बड़ी भूल सिद्ध हुई। एक तरफ पीओके के राष्ट्रपति आए दिन भारत को धमकियां देते है वहीं दूसरी और अब अफगान सीमा पर भी पाकिस्तान समर्थित तालिबान का कब्जा हो चुका है। अफगानिस्तानी नागरिकों को लग रहा है के दुनिया ने उन्हें कोई सहयोग नहीं किया। वैश्विक मंच पर  मानव अधिकारों की बाते करने वाले अक्सर कश्मीर के लिए राग आलापते नजर आए । अब जो अफगानिस्तान में हुआ उसके लिए अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार कितना संवेदनशील है यह बड़ा प्रश्नचिन्ह है ? किसी स्वायत्त देश के राष्ट्रपति को देश छोड़ना पड़ा हो ? मानव अधिकारों की बाते केवल कश्मीर में दिखती है, गाजा पट्टी में दिखती है। अमेरिका ने अफगानी राष्ट्रीय आर्मी का खोखला ढांचा दुनिया के सामने रखा। नाटो को वहा से हटा के भारतीय दखल को भी गैर संवैधानिक करार दिया। लेकिन अब एशियाई देशों में जो हालत उभरेंगे उसे अमेरिका को थोड़ी भुगतना है ? भुगतना तो एशिया को है। कोई राष्ट्रीय आर्मी बिना किसी हिंसा के सरेंडर करती हो तो उसे क्या आर्मी कहा जा सकता है ? अमेरिका की नीतियां वैसे भी हमेशा से ऐसी ही रही है, कभी भी अपने खंड में युद्ध के माहौल नहीं पैदा होने देता। अफगानी आर्मी का झूठ उसने दुनिया के सामने रखा, असल में वो कोई आर्मी थी ही नहीं, भारत जैसे देशों ने उन्हें प्रशिक्षण देने की कोशिश की लेकिन उसे भी अमेरिका ने अफ़गानी  क्षेत्र में दखल करार देकर रोके रखा। 
            सुरक्षा विशेषज्ञों की माने तो अमेरिका में रिपब्लिक पार्टी का तख्तापलट भी भारत के लिए शुभ संकेत नहीं था। जिस तख्ता पलट में अंतरराष्ट्रीय लिबरल लॉबी का पूरा नेटवर्क होने की आशंका जताई जाती है। सवाल यही है, के क्या अफगानिस्तान को तालिबानियों द्वारा टेक ओवर किया जाना और भारत से सटे सीमावर्ती इलाकों में अशांति का माहौल बनाने के पीछे भी इसी अंतरराष्ट्रीय लिबरल लॉबी का हाथ है ? जो भी हो, आनेवाले दिनों में देश को कई चुनौतियों से गुजरना पड़ सकता है। जरूरी है के देश की सरकार, सेना और देश की व्यवस्थाओं पर पूर्ण विश्वास के साथ हम देशवासियों को,आनेवाले दिनों में राष्ट्रीय हितों के मुद्दे पर एकजुट होकर के सरकार और सेना का साथ देना होगा। 
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@रोहित जगदाले पाटील
परभणी, महाराष्ट्र.

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